भावना और दुःख :-
हम जीवन में किसी ना किसी समस्याओं में उलझे हुए होते हैं जिससे हमें दुख होता है अधिकतर दुखों का कारण हमारी भावनाएं होती है यह बात आसानी से हजम होने वाली नहीं है लेकिन यह बात बिल्कुल सच है इसलिए इसे हम उदाहरण के रूप में समझते हैं मान लो आप किसी वस्तु को बहुत ज्यादा पसंद करते हैं जिसे आप कभी खोना नहीं चाहते लेकिन जीवन में ऐसी ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जिससे हमें उस वस्तु को मजबूरन छोड़ना पड़ता है जिसके कारण हमें दुख का सामना करना पड़ता है।
भावना से दुःख के कारण :-
दुख हमें इसलिए नहीं होता कि वह वस्तु हमें बहुत पसंद थी बल्कि इसलिए होता है कि हमारी पसंदीदा वस्तुओं से हमारी भावनाएं जुड़ जाती है।
दुख हमें अपनी सिर्फ पसंदीदा वस्तुओं के छोड़ने पर नहीं होता है बल्कि दुनिया की हर एक वस्तु को छोड़ने पर आपको दुख होगा जिससे आपकी भावनाएं जुड़ी होंगी जिस वस्तु को आप जरूरत से ज्यादा महत्व देंगे वह भी आपके दुखों का कारण बनेंगी।
यहां पर बात सिर्फ पसंदीदा वस्तुओं की ही नहीं है बल्कि हर उस चीज की है जिससे हम अपनी भावनाओं से एक दूसरे से जुड़ जाते हैं वो रिश्ते भी हो सकते हैं वह कोई वस्तु भी हो सकती है वह हमारी जॉब हो सकती है वह हमारी प्रकृति हो सकती है प्रकृति से जुड़े रहने का मतलब यह है कि प्रकृति के एक पेड़ के पत्ते के टूटने पर भी हमें दुख होता है।
रिश्ते भावनाओं के :-
सबसे अधिक इंसान दुखी तब होता है जब उसका किसी से कोई खास रिश्ता टूट जाता है और ऐसा इसलिए है क्योंकि इंसानों के रिश्ते अधिकतर भावनाओं पर टिके होते हैं।
भावनाओं पर नियंत्रण :-
भावनाओं में सबसे रोचक बात यह है कि भावनाओं पर कोई भी इंसान आसानी से नियंत्रण नहीं रख पाता है और अगर हमारा नियंत्रण भावनाओं पर अच्छी तरह से हो जाए तो हम ज्यादातर दुखों से छुटकारा पा सकते हैं।
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